अपना चेहरा पहली बार देखने के बाद रूपपाली गहरे ट्रॉमा और डिप्रेशन में चली गईं। उन्होंने चार बार आत्महत्या करने की कोशिश की, लेकिन इस अंधेरे दौर में उनकी माँ और उनके डॉक्टर डॉ. सुबोध उनके लिए सबसे बड़ी ताकत बनकर खड़े रहे।
उनकी माँ के शब्द और विश्वास ने रूपपाली को फिर से जीने का साहस दिया और उन्होंने तय कर लिया कि वे कायर नहीं बनेंगी, बल्कि फौलाद की तरह मज़बूत बनेंगी।


